पुणे,:  एमआईटी वर्ल्ड पीस यूनिवर्सिटी (MIT-WPU), पुणे में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) की महानिदेशक, डॉ. एन. कलईसेलवी ने राष्ट्रीय वैज्ञानिक गोलमेज सम्मेलन (NSRTC) 2025 के दूसरे संस्करण का औपचारिक उद्घाटन किया। तीन दिनों का यह कार्यक्रम 18 से 20 जुलाई तक चलेगा, जिसमें विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी के अहम क्षेत्रों में संवाद, आपसी सहयोग और इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए भारत के जाने-माने वैज्ञानिक, शिक्षा जगत के दिग्गज और शोधकर्ता एकजुट होंगे। 
IIT कानपुर के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के पूर्व सचिव, पद्मश्री प्रो. डॉ. आशुतोष शर्मा ने मुख्य अतिथि के रूप में अपनी मौजूदगी से उद्घाटन कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। इस कार्यक्रम में सी-डैक के संस्थापक-निदेशक एवं नालंदा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति, पद्म भूषण डॉ. विजय पी. भटकर भी शामिल हुए।
इस साल का सम्मेलन पाँच अहम विषयों: यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एडवांस्ड मैटेरियल्स एवं प्रोसेसिंग, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, एनर्जी एवं सस्टेनेबिलिटी, तथा हेल्थकेयर, फार्मा व बायोटेक्नोलॉजी पर केंद्रित है। इसके अलावा, इसके साथ ही, नोबेल पुरस्कार से जुड़े कार्यों पर भी विशेष सत्र आयोजित किए जाएँगे।
उद्घाटन समारोह के दौरान, भारत के जाने-माने एस्ट्रोफिजिसिस्ट में से एक, स्वर्गीय डॉ. जयंत नार्लीकर को मरणोपरांत विज्ञान महर्षि पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार के तहत 5 लाख रुपये की नकद राशि दी जाती है, जो उनकी बेटी डॉ. लीलावती नार्लीकर को दिया गया। उन्होंने अपने पिता की कुछ दिल को छू लेने वाली बातें भी साझा कीं और कहा कि यह पुरस्कार उनके लिए सबसे प्यारा और बहुत ही खास सम्मान है, जो विज्ञान को सरल और सुलभ बनाने के उनके सपने को आगे बढ़ाने में सहायक होगी। 
CSIR की महानिदेशक, डॉ. एन. कलईसेलवी ने अपने मुख्य संबोधन में कहा, "आइंस्टीन जैसे नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने कहा था कि सत्य ही विज्ञान है, और टैगोर का मानना था कि विज्ञान ही सत्य है, लेकिन MIT-WPU में आकर मैं यह कहना चाहूँगी कि विज्ञान शांति भी है। भारत धीरे-धीरे अपने 2047 के अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, और यह बात तो साफ है कि आने वाले समय में विज्ञान, टेक्नोलॉजी और इनोवेशन ही हमारे देश के विकास की सबसे बड़ी ताकत बनेंगे। अब छात्रों की सोच में भी बदलाव आया है जिसे देखकर वाकई प्रेरणा मिलती है, क्योंकि वे अब सिर्फ नौकरी नहीं ढूंढ रहे हैं, बल्कि स्टार्टअप शुरू करके दूसरों को भी रोज़गार दे रहे हैं। चुपचाप आने वाला यह बदलाव विज्ञान की वजह से ही संभव हुआ है, और इसे बढ़ावा देना बहुत ज़रूरी है।”