भोपाल : भोपाल में 15 से 49 वर्ष की महिलाएं मधुमेह से सबसे अधिक प्रभावित समूह के रूप में सामने आई हैं, जबकि बीमारी शहर की वयस्क आबादी में व्यापक रूप ले चुकी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक इस आयु वर्ग की 14% से अधिक महिलाएं (7,99,862 में से 1,14,540) मधुमेह से ग्रस्त हैं। कम सक्रिय जीवनशैली, बढ़ता मोटापा, अधिक चीनी और वसा वाले भोजन, तनाव, और देरी से निदान ये सभी कारण मिलकर समस्या को और गंभीर बनाते हैं।

मध्य प्रदेश सरकार ने इस बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। हाल ही में भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में राज्य के पहले सरकारी एंडोक्राइनोलॉजी विभाग की स्थापना की गई है, जिससे विशेषज्ञ देखभाल को मजबूती मिली है। फिर भी, गैर-संचारी रोगों (NCDs) से निपटने की सार्वजनिक पहलों में पोषण की भूमिका अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाती है।

शहर के एक कॉलेज के हेल्थ साइंसेज़ विभाग के छात्रों को संबोधित करते हुए, अमेरिका-स्थित फ़िज़ीशियंस कमिटी फ़ॉर रिस्पॉन्सिबल मेडिसिन (पीसीआरएम) के पोषण वैज्ञानिक डॉ. ज़ीशान अली ने NCDs के उपचार में संतुलित आहार हस्तक्षेप को शामिल करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

लंबे समय से उपलब्ध चिकित्सा शोध दर्शाता है कि मधुमेह और प्रीडायबिटीज के अधिकांश मामलों को आहार और जीवनशैली में बदलाव के जरिए रोका जा सकता है। एक अध्ययन में टाइप-2 मधुमेह के जोखिम वाले लोगों को 24 हफ्तों तक या तो आहार और जीवनशैली में बदलाव, एक दवा, या फिर प्लेसीबो दिया गया। तीन साल बाद देखा गया कि आहार और जीवनशैली वाली समूह में मधुमेह होने का जोखिम प्लेसीबो समूह की तुलना में 58% कम था।

रोग की प्रक्रिया समझाते हुए डॉ. अली ने बताया, “जब मांसपेशियों और जिगर की कोशिकाओं में जमा अतिरिक्त वसा कम होती है, तो इंसुलिन रेज़िस्टेंस में सुधार आता है। पौध-आधारित भोजन स्वाभाविक रूप से इस वसा को घटाता है और इंसुलिन को प्रभावी ढंग से काम करने में मदद करता है। संपूर्ण पौध-आधारित खाद्य पदार्थों पर आधारित आहार लगातार इंसुलिन संवेदनशीलता और संपूर्ण मेटाबॉलिक स्वास्थ्य में सुधार दिखाते हैं।

डॉ. अली ने कहा कि भारतीय संपूर्ण, पौध-आधारित पारंपरिक आहार पोषक रूप से पर्याप्त हैं, आंत बैक्टीरिया के लिए लाभकारी प्रीबायोटिक फाइबर देते हैं, और आसानी से उपलब्ध भी हैं। राजमा, चना, मूंग और मसूर भरपूर फाइबर और प्रोटीन प्रदान करते हैं, जबकि लौकी, टिंडा, भिंडी, और पालक जैसे सब्ज़ियां माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और फाइबर का अच्छा स्रोत हैं।

उन्होंने कहा, “अगर हर भारतीय परिवार रोज़ दो बार दाल और सब्ज़ी खाने की आदत पर लौट आए, तो देश की फाइबर की कमी का बड़ा हिस्सा दूर किया जा सकता है।

डॉ. अली का मानना है कि भोपाल जैसे शहर जीवनशैली संबंधी बीमारियों के खिलाफ अपनी लड़ाई को काफी मज़बूत बना सकते हैं बस आवश्यकता है एक ऐसे उच्च-फाइबर आहार की, जो संपूर्ण पौध-आधारित खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता दे।