कोलकाता: भारत में हरित इस्पात उत्पादन की दिशा में तेज़ी से हो रही प्रगति के साथ इस्पात उद्योग में स्क्रैप की खरीद और आपूर्ति को लेकर सोच में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। वर्ष 2030 तक देश में 30 करोड़ टन इस्पात उत्पादन क्षमता हासिल करने के लक्ष्य के मद्देनज़र, उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा विद्युत आर्क भट्ठियों तथा प्रेरण भट्ठियों के माध्यम से होने की संभावना है, जिनमें स्क्रैप प्रमुख कच्चे माल के रूप में उपयोग किया जाता है।

यह परिवर्तन केवल आर्थिक कारणों से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय स्थिरता की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भी हो रहा है। स्क्रैप आधारित इस्पात निर्माण पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस पद्धति की तुलना में 60 से 70 प्रतिशत तक कार्बन उत्सर्जन कम कर सकता है, जिससे यह कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण आधार बन गया है।

पर्यावरण, सामाजिक उत्तरदायित्व और सुशासन से जुड़े मानकों को बढ़ती प्राथमिकता मिलने के साथ अब इस्पात निर्माता स्क्रैप की गुणवत्ता, एकरूपता, स्रोत की पारदर्शिता तथा उससे जुड़े कार्बन उत्सर्जन पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। परिणामस्वरूप, स्क्रैप की खरीद अब केवल अवसर आधारित नहीं रह गई है, बल्कि प्रमाणन, डिजिटल निगरानी तथा दीर्घकालिक आपूर्ति साझेदारियों पर आधारित सुनियोजित व्यवस्था का रूप ले रही है।

इस विषय पर mjunction के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी विनय वर्मा ने कहा, "आने वाले वर्षों में स्क्रैप को केवल कम लागत वाले कच्चे माल के रूप में नहीं देखा जाएगा। यह एक ऐसे रणनीतिक संसाधन के रूप में उभरेगा, जो इस्पात उत्पादकों को कार्बन उत्सर्जन के प्रति अधिक सजग वैश्विक बाज़ार में पर्यावरणीय लक्ष्यों और परिचालन संबंधी आवश्यकताओंदोनों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।"

देश का इस्पात स्क्रैप तंत्र भी तेज़ी से बदल रहा है। वाहन स्क्रैप नीति, औद्योगिक पुनर्चक्रण को बढ़ावा, शहरी खनन की बढ़ती संभावनाएँ तथा आयातित स्क्रैप पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता इस परिवर्तन को गति दे रही हैं। साथ ही, हरित इस्पात से जुड़ी नई आवश्यकताओं के कारण उद्योग गुणवत्ता आश्वासन, स्रोत की पारदर्शिता, प्रमाणन तथा अधिक दक्ष आपूर्ति शृंखला पर विशेष बल दे रहा है।

इस्पात निर्माण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कच्चे माल कोकिंग कोयले की स्थिति पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, "पिछले कुछ महीनों में तापीय कोयले के आयात में कमी आई है, जबकि कोकिंग कोयले के आयात में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। गर्म धातु के उत्पादन में निरंतर वृद्धि को देखते हुए हमें उम्मीद है कि यह रुझान आगे भी बना रहेगा।"

वित्त वर्ष 2025-26 में गर्म धातु के उत्पादन में वर्ष-दर-वर्ष 6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई थी। इसके बाद अप्रैल–मई 2026 के दौरान भी इसमें पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इसके परिणामस्वरूप अप्रैल–मई 2026 के दौरान कोकिंग कोयले का आयात लगभग 1.25 करोड़ टन तक पहुँच गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में दर्ज 98 लाख टन की तुलना में 27.5 प्रतिशत अधिक है।

दिलचस्प बात यह है कि मई 2026 तक देश में कुल कोयला और कोक के आयात में पिछले वर्ष की तुलना में अनुमानित 6.5 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

चूँकि भारत अपनी कोकिंग कोयले की आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, इसलिए एक सुदृढ़, विश्वसनीय और कुशल स्क्रैप आपूर्ति तंत्र का विकास पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

इसी परिप्रेक्ष्य में mjunction services limited आगामी 8 और 9 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में 13वें इंडियन स्टील मार्केट्स कॉन्फ्रेंस (ISMC 2026) का आयोजन करेगा। सम्मेलन की विषयवस्तु होगी—"स्टीलाथॉन: इस्पात से स्क्रैप तक मूल्य शृंखला का निर्माण"

दो दिवसीय इस सम्मेलन में इस्पात, स्क्रैप, खनन, अवसंरचना, वाहन निर्माण, परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स, वित्तीय क्षेत्र तथा नीति निर्माण से जुड़े प्रमुख विशेषज्ञ और उद्योग जगत के प्रतिनिधि भाग लेंगे। वे इस क्षेत्र की आगामी विकास यात्रा से जुड़ी चुनौतियों और संभावनाओं पर विस्तार से विचार-विमर्श करेंगे।

सम्मेलन में लगभग 30 प्रतिष्ठित वक्ता भाग लेंगे, जो देश के प्रमुख इस्पात उत्पादकों, खनन कंपनियों, अवसंरचना विकास से जुड़ी संस्थाओं, वाहन निर्माताओं, वित्तीय संस्थानों, लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाताओं तथा नीति निर्माण से संबंधित संगठनों का प्रतिनिधित्व करेंगे।