आईपीएसएच मानकों में भोपाल के लगभग आधे अस्पताल अनफिट
भोपाल। राजधानी में लगभग 46-47 फीसदी अस्पताल आईपीएसएच मानकों में अनफिट हैं। प्रदेश की राजधानी का जब यह हाल है तो अन्य शहरों की हालत क्या होगी। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। बता दें कि प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल एमवाय इंदौर में चूहों के कुतरने से दो नवजातों की मौत और जबलपुर में मरीजों के पैर कुतरने के मामले ने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। अब स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट ने भी इस पर मुहर लगाई है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के अस्पताल इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड (आइपीएचएस) मानकों के लागू होने के तीन साल बाद भी उसके अनुरूप नहीं बन पाए हैं। प्रदेश के लगभग 50 फीसदी अस्पताल इन मापदंडों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। यहां मानक के अनुसार डॉक्टर और स्टाफ तक नहीं हैं। मरीजों के लिए जांच सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं। नतीजा, मरीजों को अस्पतालों में अच्छी सुविधाएं नहीं मिल पा रहीं। भोपाल-इंदौर में भी अस्पताल 54-55 फीसदी ही पूरे कर रहे हैं।
विभाग के मंत्री का गृह जिला रीवा पिछड़ा, सीधी-सतना आगे
उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल का गृह जिला रीवा भी आईपीएसएच मानकों को पूरा करने में पिछड़ा है। उसके पड़ोसी जिले सतना और सीधी उससे आगे हैं। कुछ छोटे शहर रतलाम, सीधी, सतना, विदिशा इन मानकों को लागू करने में आगे हैं। दरअसल, शहर के साथ गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए 2022 में आइपीएचएस मापदंड लागू किए। इसके तहत जिला, सिविल अस्पताल, सीएचसी, पीएचसी के लिए मापदंड बनाए । इनमें केवल न्यूनतम मापदंड ही तय किए गए हैं यानी कम से कम इन मापदंडों में तय सेवाएं तो अस्पतालों में होना ही चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
इसलिए पिछड़े जिले
- सभी जिला अस्पतालों में आइसीयू नहीं।
- ट्रॉमा सेंटर नाममात्र के, सुविधाएं नहीं।
- आबादी के अनुपात में अस्पताल व बेड उपलब्ध नहीं।
- मरीजों के अनुपात में विशेषज्ञ और डॉक्टर नहीं।
- अस्पतालों में बिस्तरों के अनुपात में नर्सिंग स्टाफ नहीं।
- सभी तरह जांच सुविधा नहीं।
- सीएचसी फर्स्ट रेफरल यूनिट नहीं बन पाई।
आईपीएसएच मापदंड में जिले
जिला मापदंड
भोपाल 55.49 फीसदी
इंदौर 54.43 फीसदी
ग्वालियर 50.00 फीसदी
जबलपुर 47.65 फीसदी
उज्जैन 44.4 फीसदी
रीवा 57.68 फीसदी
सतना 67.00 फीसदी
सीधी 70.00 फीसदी
सागर 62.61 फीसदी
रतलाम 81.22 फीसदी
विदिशा 66 फीसदी
आइपीएचएस के ये प्रमुख मापदंड
- जिला अस्पताल में हाई डिपेंडेंसी यूनिट, आइसीयू, ओटी, प्रसव-रिकवरी परिसर, विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई और जांच लैब।
- जिले में प्रति 1000 आबादी पर अस्पताल में दो बेड उपलब्ध हों।
- जिला अस्पताल में चिकित्सा अधिकारी, सामान्य चिकित्सा विशेषज्ञ, प्रसूति रोग व बाल रोग, हड्डी रोग-नेत्र रोग विशेषज्ञ, एनेस्थिसियोलॉजिस्ट, दंत चिकित्सक, रेडियोलॉजिस्ट और ईएनटी, एवं मनोरोग विशेषज्ञ होना अनिवार्य है।
- जिला अस्पतालों में प्रति बेड 450 लीटर पानी रोज रहे।
- 100 बेड वाले एसडीएच व डीएच को विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई में 12 बेड और एमएनसीयू में 12 बेड हों।
- 100 बेड वाले अस्पतालों में 67 आॅक्सीजन युक्त बेड जरूरी।
- सामान्य वार्ड में प्रति छह बिस्तरों पर एक नर्स हो। आईसीयू में हर इकाई के लिए एक नर्स और एचडीयू में प्रति दो इकाइयों के लिए एक नर्स होनी चाहिए।
- नवजात शिशु गहन चिकित्सा इकाइयों, बाल चिकित्सा गहन चिकित्सा इकाइयों और बाल चिकित्सा उच्च निर्भरता इकाइयों के लिए प्रति दो इकाइयों पर एक नर्स होना चाहिए।
त्वचा हो ठंडी और दमकती, ये 5 मिनट के फेस पैक आजमाएं
केतली से बने टेस्टी डिश, 7 रेसिपी जो आप मिस नहीं कर सकते
सियासी घमासान तेज: NIA पर ममता बनर्जी का तीखा हमला
मटर पनीर और नान को एयर फ्रायर में बनाने की ट्रिक
बिना सामान लिए भुगतान, अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध